नादयोग – ध्वनि से शरीर का उपचार करने की शक्ति

नाद का अर्थ है – शब्द, ध्वनि और आवाज। संगीत दामोदर के अनुसार नाद 3 प्रकार के होते है – प्राणिभव, अप्राणिभव,  उभयसंभव|

जो अंगों से उत्पन्न किया जाता है वह प्राणिभव कहलाता है। जो वीणा आदि से निकलता है वह अप्राणिभव कहलाता है और जो बाँसुरी से निकाला जाता है वह उभय- संभव नाद है।

नाद के बिना राग ,गीत, स्वर, कुछ भी संभव नहीं है। सारा जगत् नादात्मक है। इस दृष्टि से नाद दो प्रकार का है— आहत और अनाहत। आहत का अर्थ है वस्तुओं के संयोग से बनी ध्वनि, जबकि स्वयं से ही उत्पान ध्वनि को अनाहत कहा जाता है|

नाद योग के उद्देश्य की बात करे तो आहद से अनाहद की ओर ले जाना ही इसका मुख्य उद्देश्य है। इसके लिए आप सबसे पहले एक नाद उत्पन्न करो, फिर उस नाद के साथ अपने मन को जोड़ो। मन को एकतार में लगाए रखने के लिए ही तो ॐ का अविष्कार हुआ है। इससे साधक के ज्ञान में वृद्धि होती है।जीवन आनंद से भरपूर हो जाता है| इसे करने से श्रवण शक्ति  बहुत तेज होती है|

परमात्मा को समझने के लिए Naad Yoga को सबसे बेहतर माना गया है। नाद तभी  सुनाई देता है  जब किसी व्यक्ति को इसमें सफलता मिलने लगती है,  नाद का सुनाई देना सिद्धि प्राप्ति का इशारा है।

Naad Yoga: ॐ मंत्र जाप करने का सही तरीका

Naad Yoga

ऐसे करे नाद को उत्पन्न

इस ॐ की ध्वनि का  जाँच-पड़ताल करना ही नाद योग कहलाता है।  जब आप ॐ का उच्चारण करते है तो आपके कानो में ॐ की ध्वनि सुनाई देती है।  ऊँ का उच्चारण करने से आपके शरीर के किन-किन हिस्सों में  इसका प्रभाव पड़ा उसे ध्यान से समझे  और इसका अध्ययन करे।

इसे करने के लिए सबसे पहले अपने कानो को अगुठे या अंगुली से बंद कर दे| और  फिर  ॐ का  उच्चारण  करे।  इसका सबसे ज्यादा प्रभाव आपके गाल , गर्दन और मुँह पर पड़ेगा। इसके  बाद नाक ,कानो के पीछे का हिस्सा और सर पर यह गुंजन को महसूस करे|

यह नाद की तरंगे कहाँ कहाँ जा रही है और कहाँ से आ रही है।  इन नाद तरंगो को खोजना  और उनका अध्यन करना ही नाद योग कहलाता है| नाद  को जब आप करते हो तो वह इसकी पहली अवस्था होती है।

क्या होता है जब आप नाद योग में सफल हो जाते है  

  • ॐ के लगातार उच्चारण के अभ्यास पर एक समय ऐसा आ जाता है जब आपको ॐ का उच्चारण करने की आवश्यकता नहीं होती है|
  • इसमें आपको सिर्फ अपने कान और आंखे बंद करनी होती होती है| खुद ब खुद आप अपने भीतर से ॐ का उच्चारण सुनने लगते है।
  • शुरुआत में यह ध्वनि आपको कम सुनाई देती है लेकिन इसके निरंतर अभ्यास से यह बढ़ती जाती है|
  • साधु- संतो का कहना हैं कि प्रारंभ में यह ध्वनि झींगुर की आवाज जैसी सुनाई देगी।
  • फिर धीरे-धीरे ऐसा लगेगा की बीन बज रही हो, इसके बाद धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी।
  • हम हमारे कामो में इतना व्यस्त रहते है की अपने अंदर की आवाज भी नहीं सुन पाते है।
  • योग कहता हैं कि इसे सुनने के लिए शुरुआत स्वयं के भीतर से ही करना होगी।

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