सम्पूर्ण शरीर के विकास और व्यायाम के लिए आवश्यक जालंधर बंध

प्राणायाम की साधना में बांधो का प्रमुख स्थान है| ध्यानात्मक आसनों से पूरा लाभ लेने के लिए उनके साथ-साथ तीन बंध साधने की शुरुवात योगियों ने की थी| प्राणायाम के लिए यह बंध सहयोगी सिद्ध होते है| इन् बंधो का फल ध्यान और प्राणायाम के साथ ही मिलता है जो मानसिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष के रूप में होता है|

यह बंध तीन प्रकार के होते है| आज हम आपको जालंधर बंध के बारे में जानकारी देने वाले है| इसे चिन बंध भी कहते हैं| ऐसा माना जाता है कि इस बंध का अविष्कार जालंधरिपाद ऋषि ने किया था इसीलिए उनके नाम पर इस बंध का नाम जालंधर बंध रख गया है|

हठयोग प्रदीपिका और घेरंड संहिता में इस बंध के अनेक लाभ बताएँ गए हैं, कहा जाता है कि यह बंध मौत के जाल को भी काटने की ताकत रखता है, क्योंकि इससे दिमाग, दिल और मेरुदंड की नाड़ियों में निरंतर रक्त संचार सुचारु रूप से संचालित होता रहता है| आइये जानते है Jalandhara Bandha in Hindi.

Jalandhara Bandha in Hindi: जानिए इसकी विधि और लाभ

Jalandhara Bandha in Hindi

हमारे सिर में बहुत सी वात-नाडिय़ों का एक जाल सा फैला हुआ होता है| इन्हीं के द्वारा हमारे शरीर का संचालन होता है| इसलिए इस हिस्से का स्वस्थ रहना बहुत आवश्यक है| इसके लिए जालंधर बंध सबसे अच्छा उपाय है जिससे सिर का अच्छे से व्यायाम होता है और हम स्वस्थ रहते हैं|

जालंधर बंध क्रिया के अभ्यास से श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया पर अधिकार होता है तथा ज्ञान तन्तु बलवान होते है| हठयोग में बताया गया है कि इस बंध का प्रभाव शरीर के सोलह स्थान की नाड़ियो पर पड़ता है|

इसमें पादांगुष्ठ, गुल्फ, घुटने, जंघा, सीवनी, लिंग, नाभि, हदय, ग्रीवा, कण्ठ, लम्बिका, नासिका, भ्रू, कपाल, मूर्धा और ब्रह्मरंध्र| यह सोलह स्थान जालंधर बंध के प्रभाव क्षेत्र हैं| इस तरह से विशुद्धि चक्र के जागरण में जालंधर बंध से बड़ी सहायता मिलती है|

Jalandhara Bandha Yoga: जालंधर बंध की विधि

जालंधर बंध करने के लिए किसी समतल जमीन पर कंबल या दरी बिछाकर पद्मासन में बैठ जाएं| इसके बाद शरीर को एकदम सीधा रखें| अब गर्दन के भाग को झुकाए, जिससे गला और ठोड़ी आपस में स्पर्श हो सके| कुछ योगियों के अनुसार सिर और गर्दन को इतना झुकाना चाहिए कि ठोड़ी की हड्डी के नीचे छाती के भाग को स्पर्श करे और ठोड़ी में चार-पांच अंगुल का अंतर रह जाए|

इस क्रिया में ठोड़ी को नीचे लाने और फिर ऊँची उठाकर सीधा करने का क्रम चलाया जाना चाहिए| साथ ही साँस को भरने और निकालने का क्रम भी जारी रखें| इससे अनाहत, विशुद्धि और आज्ञा चक्र तीनों पर भी प्रभाव और दबाव पड़ता है| इससे मस्तिष्क को कपाल भाति प्राणायाम की तरह लाभ मिलता है|

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Jalandhara Bandha Benefits: जानिए इसके लाभ

जालंधर बंध के अभ्यास से प्राणो का संचरण ठीक तरह से होता है| इड़ा और पिंगला नमक नाड़ी बंद होकर प्राण सुषुन्मा में प्रविष्ट होती है| जिसके कारण मस्तिष्क के दोनों हिस्सों में सक्रियता बढ़ती है और गर्दन की माँसपेशियों में रक्त का संचार भी ठीक से होने लगता है, जिससे उनमें दृढ़ता आती है| कंठ की रुकावट समाप्त होती है| मेरुदंड यानि रीढ़ की हड्डी में ‍खिंचाव होने से उसमें रक्त का संचार तेजी से बढ़ता है| इस कारण सभी रोग दूर होते हैं और व्यक्ति सदा स्वस्थ बना रहता है|

इस क्रिया के अभ्यास से हमारे सिर, मस्तिष्क, आंख, नाक, कान, गले की नाड़ी का संचालन नियंत्रित रहता है तथा इन सभी अंगो का जाल और धमनियों आदि को स्वस्थ बनाए रखता है| यह सभी Jalandhara Bandha Benefits है|

सावधानियां

  1. इस क्रिया की शुरुवात में सामान्य श्वास ग्रहण करके जालंधर बंध लगाना चाहिए|
  2. यदि गले में किसी प्रकार की तकलीफ या दर्द हो तो इसे न करें|
  3. बल लगाकर या जबरदस्ती श्वास ग्रहण करके जालंधर न लगाएँ|
  4. श्वास की तकलीफ या सर्दी-जुकाम हो तो भी इसे ना करें|

आज आपने जाना Jalandhara Bandha in Hindi, सभी प्रकार के बंध को करना बहुत कठिन है| इसलिए योग शिक्षक से अच्छे से सीखकर ही इसे करना चाहिए|

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