कर्मयोग क्या है - इसकी परिभाषा और प्रकारों की जानकारी

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कर्मयोग क्या है - इसकी परिभाषा और प्रकारों की जानकारी

कर्म ही पूजा है ये तो आप सभी जानते होंगे। कर्म मतलब कार्य करना। शारीरिक और मानसिक कार्य करना कर्म कहलाता है। हम जो करते है, सोचते है या कहते है इस सबका एक प्रभाव बनता है जो एक निश्चित समय पर प्रतिफल के रूप में मिलता है और जो प्रतिफल मिलता है उसे हम भाग्य कहते है।

कहते है जो हमें मिलता है वह हमारे पहले के कर्म होते है। और जो हमें दुर्भाग्य के रूप में मिलता है वो हमारे पहले के बुरे कर्म का नतीजा होता है| आप जिस पल में है वह आपका काम करने का समय है और उसमे आनंद तभी आता है जब आप पूरी लगन के साथ अपनी इच्छा से काम करते है|

जब आप परिणाम की चिंता किये बिना कार्य करते है, यह जाने बिना की वो आपके हित में होगा या नहीं, इसे ही हम कर्म योग कहते है। इसके लिए गीता में एक श्लोक कहा गया है की "कर्म करते जा फल की इच्छा मत कर"

Karma Yoga in Hindi: अपने कार्य में पूर्णता प्राप्त करने की प्रक्रिया

Karma Yoga in Hindi

कर्म के दो प्रकार होते है

  • सकाम कर्म
  • निष्काम कर्म

सकाम कर्म :

स्वयं के लाभ के लिए किया गया कर्म सकाम कर्म कहलाता है। इसमें स्वार्थ पूर्ण भाव होता है  कर्म 'मेरे' और 'तेरे' के बीच द्वन्द्वता (दो अलग-अलग होने की भावना) को और अधिक गहरा करते हैं। सकाम कर्म हमें जन्म और मृत्यु के चक्र से बांधता है।

निष्काम कर्म:

स्वार्थहीनता वाले कर्म को निष्काम कर्म कहते है। स्वार्थहीन होने की भावना हमें हमारे अहंकार से बहुत दूर ले जाता है। यह सभी को साथ लेकर एकता की और बढ़ाता है। निष्काम कर्म हमे अहंकार की भावना से स्वतंत्र कर देता है। हमारे भारत में नि:स्वार्थ भाव के प्रतीक वर्षा, वृक्ष, नदी और संत को माना जाता है।
  • वर्षा सभी को सामान रूप से लाभ देती है फिर चाहे प्रकृति, मानव या पशु पक्षी हो, सब पर एक समान होती है।
  • वही पर वृक्ष सभी को छाया देते है। अगर आप पत्थर मारते है तो भी ये आपको फल ही प्रदान करते है। किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं होता।
  • नदी भी इसी तरह का व्यवहार रखती है। वो प्यासो की प्यास बुझाती है फिर चाहे वह एक छोटा जीव हो या कोई विशालकाय प्राणी।
  • वही पर एक संत बिना किसी भेदभाव के अपना आशीर्वाद और शुभकामनाएं सभी को प्रदान करता है|
  • क्षमा भाव, समझ और सहायता निष्काम कर्म होते हैं जो हमें कर्म के चक्रों से आजाद कर देते हैं।
  • आपको बता दे की जो भविष्य की घटनाये होती है ये संयोगवश नहीं होती है। ये हमारे पहले के और वर्तमान के कार्यो के प्रभाव से ही होती है। इसलिए हमारा भाग्य हमारे कर्म पर ही निर्भर करता है।
  • "दैनिक जीवन में योग" के अभ्यास में सार्थक धारणा, बुद्घि और निस्वार्थ सेवा से हम अपने कर्मों के फल को कम व परिवर्तित कर सकते हैं और अपने प्रारब्ध (भविष्य) को सार्थक दिशा दे सकते हैं।
  • यदि इसी जन्म में अपने कर्मों का फल नहीं भोगा तो हमें पुनः जन्म लेकर उन्हें भोगना पडता है ।
  • जिन कर्मों से पुण्य अथवा पापार्जन नहीं हो पाता वे क्रिया कहलाते हैं। जैसे छींकना, पलकें झपकाना, आदि|

कर्मयोग की परिभाषा

  • यह साधना का मार्ग होता है जो हमें इस बात की जानकारी देता है की:-
  • हम कर्म और कृत्य क्यों करते हैं और कैसे करते है?
  • हमारे कर्म अथवा कार्य हमें बंधन में क्यों बांध देते हैं?
  • फल में फंसे बिना कर्म कैसे करें?
  • कौन से कर्म माया से अर्थात जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करते हैं?फल में फंसे बिना कर्म कैसे करें?
  • जीवन-मुक्त होने के उपरांत भी कर्म करते रहने का क्या महत्त्व है?
  • इसलिए हमें कर्म इस प्रकार करना कि जब उसका फल मिले तो वह मुक्ति,आध्यात्मिक उन्नति अथवा ईश्वर-प्राप्ति वाला हो।
  • कर्म बिना किसी लालच के किया जाना चाहिए।
आमतोर पर स्त्रियाँ बेहतर कर्म योगी होती है। वह निष्काम कर्म का एक सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करती है। पति और बच्चों के साथ गृहिणी का दायित्व निभाना एक पूर्णकालिक काम है। लेकिन अगर वह खाना बनाती है तो बिना खुद खाये अपने पति और बच्चे को खिलाना चाहती है। उन्हें खुद के लिए फल की कोई इच्छा नहीं होती है|