शरीर की शुद्धि और रोगों से मुक्ति के लिए करें षट्कर्म क्रियाएं

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शरीर की शुद्धि और रोगों से मुक्ति के लिए करें षट्कर्म क्रियाएं

योग साधना की सभी क्रियाओं का अपना महत्व है। परंतु षट्कर्मो का अपना अलग ही महत्त्व है। योगाभ्यास में सफलता के लिए षट्कर्म के द्वारा शरीर को साफ व शुद्ध करना आवश्यक है। इसके अभ्यास के बिना यदि कोई व्यक्ति योगाभ्यास करता है, तो उसे योग में सफलता प्राप्त करने में अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

षट्कर्म अर्थात छः कर्म, यह हठयोग में बताई गयी छः शोधन क्रियाएं है| हमारे शरीर में तीन तरह के दोष होते है-वात, पित्त और कफ जो सामान्यतः किसी को भी हो सकते है| योग में कई ऐसी शोधन क्रियाएं हैं, जिनके अभ्यास से हम इन् दोषो और अन्य रोगों से मुक्ति पा सकते है|

षटकर्म क्रिया के अंतर्गत नेति, कपालभांति, धौति, नौलि, बस्ति और त्राटक क्रिया आती हैं। यहाँ हम आपको इन् शोधन क्रिया को करने और इनसे होने वाले लाभ के बारे में बताने वाले है| लेकिन ये क्रियाएं बहुत कठिन होती हैं इसलिए इनका अभ्यास अनुभवी योगाचार्य के सानिध्य में करना चाहिए, और अच्छी तरह अभ्यासरत हो जाने के बाद ही इन्हे घर पर करना चाहिए | आइये जानते है  Shatkarma in Hindi.

Shatkarma in Hindi: जानिए षट्कर्म क्रियाओं की विधि और लाभ

Shatkarma in Hindi

Neti Kriya: नेति क्रिया

Neti Kriya की प्रकार की होती है| यह श्वसन संस्थान के अवयवों की सफाई के लिए प्रयोग की जाने वाली क्रिया है| इसे करने से प्राणायाम करने में भी आसानी होती है|

Sutra Neti - सूत्र नेति

इसे करने के लिए एक मोटा और कोमल धागा लीजिए जो नासिका छिद्र में आसानी से जा सके। इसे हल्के गर्म पानी में भिगो लें और इसका एक छोर नासिका छिद्र में डाल कर मुँह से बाहर निकलने का प्रयास करें| इससे नाक और गले की आंतरिक सफाई होती है। आँख, दाँत और कान स्वस्थ्य बनते हैं।

Jal Neti - जल नेति

जैसा की इसके नाम से ही समझ आता है की इस क्रिया में हमे जल यानि पानी का प्रयोग करना होता है| इसलिए इसे Jal Neti Kriya कहा जाता है| इसे करने के लिए नासिका छिद्रो से धीरे-धीरे पानी पिया जाता है| इसके लिए किसी सामान्य बर्तन की जगह नलीदार बर्तन का उपयोग करना चाहिए, जिससे आसानी से पानी पीने में आसानी रहें| लेकिन आपको पनि नाक से खींचना नहीं है| ऐसा करने से आपको परेशानी का अनुभव हो सकता है|

Kapal Neti - कपाल नेति

यह क्रिया अन्य क्रियाओं से अलग है| इसे करने के लिए मुंह से पानी पी कर नाक से निकलना होता है|

इन् क्रियाओं के अभ्यास से मस्तिष्क का भारीपन समाप्त हो जाता है, जिससे दिमाग शांत, हल्का और सेहतमंद बना रहता है| इस क्रिया के नियमित अभ्यास से नासिका मार्ग की सफाई हो जाती है| साथ ही नाक, कान, दांत,गले आदि के समस्त रोगों से राहत मिलती है| इसे करते रहने से सर्दी-जुकाम और खांसी की शिकायत नहीं रहती है|

Kapalbhati - कपालभांति

इसमें सिद्धासन या पद्मासन में सीधे बैठकर हाथ की प्राणायाम मुद्रा बनाई जाती है। इसके बाद सांस लेकर जोर से झटके के साथ बाहा निकाला जाता है। ऐसा करते हुए पेट पहले बाहर की ओर जाता है और फिर उसे भीतर की ओर खींचकर रीढ़ की हड्डी की ओर लगाया जाता है। यह क्रिया कई बार दोहराई जाती है। इससे शरीर में मौजूद बढ़ी हुई कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बाहर निकलती है और शरीर के अंदरूनी अंगों तक ऑक्सीजन की सप्लाई होती है। इस क्रिया को बार-बार बलपूर्वक करना वातकर्म कपालभाति कहलाता है। इसके अभ्यास से कफ संबंधी दोष भी दूर होते हैं।

यह  प्राणायाम आपके चेहरे की झुर्रियां और आंखों के नीचे का कालापन हटाकर चेहरे की चमक बढ़ाता है। दांतों और बालों के सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं। शरीर की चरबी कम होती है। कब्ज, गैस, एसिडिटी की समस्या में लाभदायक है। शरीर और मन के सभी प्रकार के नकारात्मक तत्व और विचार मिट जाते हैं।

Dhauti Kriya – धौति क्रिया

Dhauti Kriya बारह प्रकार की होती है| इस क्रिया का अभ्यास करना सबसे आसान व सुरक्षित और बहुत ही लाभ देने वाला है | इसके करने से शरीर के अंदर नाड़ी जाल शुद्ध होता है और शरीर हल्का और स्वस्थ हो जाता है | शरीर के अंदर रक्त संचरण ठीक तरह से होने लगता है| इस विधि का उपयोग पेट की बीमारी को दूर करने के लिए किया जाता है | इसके अभ्यास से अम्लपित्त, दमा, साँस से जुडी हुई परेशानी, प्लीहा, गुल्म, जथारशोथ आदि अनेक बीमारियों को ठीक करता है |

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Basti Kriya - बस्ति क्रिया

यह क्रिया दो प्रकार की होती है-जल बस्ति और स्थल बस्ति। जल Basti Kriya में गुदा के अंदर जल का आकुंचन किया जाता है। इस क्रिया में बड़ी आंत में मौजूद मल को पानी की मदद से बाहर निकाला जाता है। जबकि स्थल बस्ति में अश्विनी मुद्रा में गुदामार्ग का आकुंचन किया जाता है। इस क्रिया में गुदा मार्ग से वायु अंदर लेकर उसे बाहर निकाला जाता है। इसे पवन बस्ति भी कहते हैं। इस क्रिया से पाचन क्रिया रोग मुक्त होती है और भूख बढ़ती है।

यह गुदा की सफाई के लिए प्रयु‍क्त किया जाता है। साधक तेल लगी हुई एक नलिका अपनी गुदा में डालकर घुटने तक भरे किसी साफ पानी के बड़े बर्तन में बैठकर उड्डीयानबंध लगाता है। जब वह उड्डीयानबंध खोलता है तो पानी उसकी गुदा की ओर बड़ी आँत में धीरे-धीरे भरने लगता है।

इसके बाद जब वह पुन: उड्डीयानबंध लगाता है तो उसके मल द्वार से पानी धीरे-धीरे बाहर निकलने लगता है। इससे बड़ी आँत और गुदा की सफाई हो जाती है तथा इनसे संबंधित रोग दूर होते हैं। एनिमा लेने से भी यह लाभ प्राप्त होता है।

एक दूसरे प्रकार की बस्ती भी है जिसे शुष्क बस्ती अथवा पवन बस्ती कहते हैं। बहनीसार धौती में जैसे बताया गया है उसी प्रकार लेट जाएँ। मल द्वार को अनेक बार संकुचित कर ढीला छोड़े। इससे शरीर की पाचन शक्ति बढ़ती है तथा शरीर मजबूत बनता है।

Tratak Kriya - त्राटक क्रिया

Tratak Kriya एक आसान क्रिया है| इसे करने के लिए जितनी देर तक आप बिना पलक गिराए किसी एक बिंदु, मोमबत्ती या दीपक की ज्योति को देख सकते है उसे देखते रहें| इसके बाद आंख को बंद कर लें| कुछ समय तक इसका अभ्यास करें| यह क्रिया आँखों से सम्बंधित समस्या और छाती में जमे हुए बलगम या कफ को बहार निकलने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है|

Nauli Kriya - नौली क्रिया

पेट को हिलाने की क्रिया को न्योली या Nauli Kriya कहा जाता है| इस क्रिया को करते समय पेट नली के समान नजर आता है| इसलिए इसे नौली क्रिया कहा जाता है|

इसे करने के लिए पद्मासन की स्थिति में दोनों हाथो से दोनों घुटनो को दबाकर रखते हुए शरीर को सीधा रखें| इसके पश्चात साँस को बाहर निकालकर खाली पेट की मांसपेशियों को ढीला छोड़ते हुए अंदर की तरफ खींचे| इसके बाद स्नायु को ढीला छोड़ते हुए पेट को दाई से बायीं ओर घुमाएं| ऐसा करने से पेट में किसी तरह की गंदगी नहीं रह जाती है|

आज आपने जाना Shatkarma in Hindi, यह क्रिया शारीरिक और मानसिक दोनों रूपों से हमारे लिए फायदेमंद होती है| लेकिन यह बहुत ही कठिन होती है| इसलिए योग गुरु से अच्छी तरह सीखने के बाद ही इसे करना चाहिए|