शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों रूपों में लाभकारी है उड्डीयान बंध

उम्र के साथ व्यक्ति की त्वचा ढीली होने लगती है और पेट बढ़ने लगता है| शरीर की जिन नदियों में रक्त बहता है वे भी कमजोर होने लग जाती है| यह एक क्रम है जो हर व्यक्ति के साथ होता है, लेकिन आज हम ऐसे एक आसन के बारे में बता रहे है| जो आपकी बढ़ती आयु के असर को कम करने में सहायक होता है|योग के इस बंध और क्रिया को करने से व्यक्ति हमेशा तरोताजा और युवा बना रह सकता है। इस बंध का नाम है उड्डियान बंध| संस्कृत में एक श्लोक है|

उदरे पश्चिमं तानं नाभेरूर्ध्वं तु कारयेत्।

उड्डानं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः।

उड्डीयानं त्वसो बन्धो मृत्युमातंग केशरी ॥

अथ उड्डीयानबन्धस्य फलकथनम्।

समग्राद् बन्धनाद्धयेतदुड्डीयानं विशिष्यते।

उड्डीयाने समभ्यस्ते मुक्तिः स्वाभाविकी भवेत् ॥

श्रीघेरण्डसंहितायां घेरण्डचण्डसंवादे घटस्थयोगप्रकरणे मुद्राप्रयोगो नाम  तृतीयोपदेशः ॥

जिसका अर्थ है, इस बंध के कारण आँख, कान, नाक और मुंह अर्थात सातों द्वार बंद हो जाते है और इसके फलस्वरूप प्राण सुषुम्ना में प्रविष्ट होकर ऊपर की तरफ उड़न भरने लगते है, इसलिए इसे उड्डियान बंध कहा जाता है| आइये जानते है Uddiyana Bandha in Hindi.

Uddiyana Bandha in Hindi: जानिए इसकी विधि और लाभ  

Uddiyana Bandha in Hindi

उड्डियान बंध को दो तरह से किया जा सकता है, खड़े होकर और बैठकर| यहाँ हम आपको इसकी दोनों विधि बता रहे है| आइये जानते है Uddiyana Bandha Steps

उड्डीयान बंध करने की विधि

खड़े होकर करने की विधि

इसके लिए सबसे पहले दोनों पाँवों के बीच अंतर रखते हुए, घुटनों को मोड़कर थोड़ा-सा आगे की तरफ झुकाए| अब दोनों हाथों को जाँघों पर रखें और मुँह से  हवा को बाहर निकालकर नाभी को अंदर खींचकर सातों छीद्रों को बंद करने का प्रयास करें| यह उड्‍डीयान बंध है। अर्थात रेचक करके अर्थात श्वास को बाहर निकालकर 20 से 30 सेंकंड तक बाह्य कुंभक करें।

बैठकर करने की विधि

इसे बैठकर करना भी बहुत आसान है| इसके लिए सुखासन या पद्मासन में बैठकर हाथों की हथेलियों को घुटनों पर रखें और थोड़ा आगे की ओर झुकते हुए  पेट के स्नायुओं को अंदर खींचते हुए पूर्ण रेचक करें अर्थात साँस को बाहर निकलें तथा बाह्म कुंभक करें अर्थात बाहर ही रोककर रखें|

अब इसके पश्चात साँस धीरे-धीरे अंदर लेते हुए पसलियों को ऊपर उठाएँ और  साँस को छाती में ही रोककर रखें एवं पेट को ढीला छोड़ दें। इस अवस्था में पेट अंदर की सिकोड़ सकते है उतना सिकोड़े| इन् दोनों ही तरह की विधि या क्रिया में पेट अंदर की ओर जाता है। इसके अभ्यास के माध्यम से ही नौली क्रिया की जा सकती है।

इस बंध को खली पेट करना चाहिए| शुरुवात में इसे 3 बार तथा धीरे-धीरे इसे बढ़ाकर सामर्थ्य के अनुसार 21 बार तक किया जा सकता है|

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उड्डीयान बंध के लाभ

  1. उड्डियानबंध के अभ्यास से आमाशय,लिवर व गुर्दे सक्रिय होकर अपना कार्य ठीक तरह से करने लगते हैं| साथ ही इन अंगों से सम्बंधित सभी तरह के रोग दूर हो जाते हैं।
  2. यह बंध से पेट, पेडु और कमर की माँसपेशियाँ सक्रिय होकर शक्तिशाली बनता है तथा अजीर्ण को दूर कर पाचन शक्ति को बढाता है| साथ ही यह पेट और कमर की चर्बी को कम करने में भी सहायक होता है|
  3. इस बंध के अभ्यास से उम्र के बढ़ते असर को रोका जा सकता है। इसे करने से व्यक्ति हमेशा युवा बना रह सकता है| यह सभी Uddiyana Bandha Benefits है|

सावधानियां

  1. उड्डियान बंध को प्रातः के समय में अपने दैनिक नित्यक्रम के बाद करना चाहिए तथा इसे खली पेट ही करना चाहिए|
  2. गर्भवती महिलाओं, ह्रदय रोगियों, पेट में किसी तरह का रोग आदि होने पर इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए|
  3. उड्डीयान बंध करते समय किसी तरह की तकलीफ या परेशानी होने पर इसे नहीं करना चाहिए|

उड्डीयान बंध के कुछ आध्यात्मिक लाभ भी है इसलिए साधु संत और ऋषि मुनि भी इस क्रिया को अवश्य करते है| इसके नियमित अभ्यास से मणिपूरक चक्र जाग्रत हो जाते है| इस बंध को करने से प्राण उर्ध्वमुखी होकर सुषुम्ना नदी में प्रवेश करते है जिससे साधक को अलौकिक शक्तियों की भी प्राप्ति होती है|

आज हमने आपको Uddiyana Bandha in Hindi, से सम्बंधित सम्पूर्णजनकरी प्रदान की है, जो किसी न किसी तरीके से आपके लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होंगे| यह क्रिया करने में आपको शुरुवात में परेशानी आ सकती है| इसलिए इसे किसी योग गुरु के सानिध्य में ही करें|

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